|
 |
| |
| चेतावनी |
|
हाहाकर से तपती इस अपनी ही धरती पर
संकट के तुमुल बादल छाये है
चारों ओर प्रतिशोध की अग्नि लगी है
और चल रही आक्रोश की गर्म हवायें है
रक्त जल बन कर यहाँ बरस रहा है
और उसमें लथपथ धरती का स्वर्ग बन नरक रहा है
क्योंकि हमारे स्वर्ग में कुछ राक्षस घुस पड़े है
पता नहीं क्यों वो उसे छीनने पर अड़े है
राजा के सिर से उसका मुकुट उतार लेना इतना आसान नहीं होता है
उसके लिए तो फिर युद्ध होता है
किन्तु राक्षासी प्रकृति तो फिर भी राक्षासी होती है
उसमें दिखने वाला बल तो होता है
पर बुद्धि नहीं होती है
हम महान क्षत्रियों के वंशज है उन्हें मान लेना होगा
अन्यथा इसका मूल्य उन्हें स्वंय देना होगा
वो जान ले कि शत्रु विनाशक यन्त्रों की हमारे पास भरमार है
सबको एक साथ ही मिटा दे हम ऐसी तलवार है
हम तब तक कुछ नहीं करते जब तक कोइ हमें विवश न करे
हम भिड़ते नहीं किसी से जब तक कोई बहस न करे
सोये हुए सिंह को यदि छेड़ कर जगाओगे
निश्चित रूप से भयंकर परिणाम पाओगे
पहले हमने मित्रता का हाथ बढ़ाया
तो उधर से शत्रुता का सन्देश आया
उनके विद्यालयों मे मात्र विलोम ही पढ़ाया जाता है
तभी हमारा एक भी शब्द उनकी समझ में नहीं आ पाता है
हमारी प्रवृति, हमारी शिक्षा और
हमारे संसकार सब हमारे साथ है
उनमें इन तीनों का आभाव है,
जो शोचनीय बात है
एक राजा किसी भी दूसरे राजा के साथ ही युद्ध करता है
क्योंकि युद्ध तो बराबर वालों के साथ ही होता है
और जब राजा किसी को दान देता है
तो उसकी दया का पात्र होता है
ये किसी भी स्तर से युद्ध कदापि नहीं है
हमारे मिष्ठान पर कुछ मख्खियाँ भिनभिना रही है
जिन्हें हम हटा रहे है ये बात सही है
असली युद्ध का विगुल तो जब हम बजायेगें
तो हमारे पड़ोसी के कान ध्वनि सुनते ही फट जायेगें
और हमसे कुछ छीनने के स्थान पर स्वंय अपना सब कुछ हमें सौंप जायेगें
ये आज उनको, हमारी ओर से खुली चेतावनी है |
|
| |
|
|