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| प्रयास |
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कब तक चलेगा ये सब ?
जब कुछ भी न बचेगा तब ?
ये हम कहाँ जा रहे है ?
विश्वास के बदले हम क्या पा रहे है ?
क्या ये सब सही हैं
हमने वही चीजें सदा की है जो कहीं है
पर बदले में हमें क्या मिला ?
अविश्वास की मिट्टी में क्या कोई फूल है खिला ?
एक प्रयास, दो प्रयास और फिर एक प्रयास
सदा कुछ अच्छा कुछ नया होने की आस
किन्तु अन्त वही पुराना
द्वेष की अग्नि का फिर से बढ़ जाना,
जिसमें न जाने कितने जल रहे है ?
वो जला रहे है और हम खड़े हाथ मल रहे है
ये सब क्या हो रहा है ?
लगता है पूरा मण्डल जागते हुए भी सो रहा है
समस्या हल करनी है तो ठोस कदम उठाना होगा
अपने अन्दर छिपी शक्ति को जगाना होगा
मात्र खोखली बातों से काम नहीं चलेगा
मजबूत कदम उठाये तभी ये पत्थर हिलेगा
जो शायद दूरियाँ कम कर दे ?
शायद प्रेम और सौहार्द भर दे ?
किन्तु ये शायद अपने आप में एक प्रश्न चिन्ह है
क्या हम सब मानव जाति के होते हुए भी भिन्न है ?
या हमारी भाषा कुछ कठिन है ?
हम कहते रात तो वो समझते दिन है
विश्वास प्रेम, एकता कब तक समझाये
इस बार ईश्वर करे उन्हें समझ में तो आये
प्रतीक्षा, प्रतीक्षा और प्रतीक्षा
यही हमारी है सबसे बड़ी परीक्षा
आशा करते है इस बार नतीजा अच्छा ही आयेगा
वो आश्वस्त रहें, ये दयावान हृदय एक बार उन्हें फिर अपनायेगा-2 |
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