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| शान्ति |
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शान्ति के पथ पर यदि हम चल के दिखायें
अपने अन्तर में शान्ति का घर बसायें
तो निःसन्देह भारत, भारत बन जायें
किन्तु ऐसा क्यों नहीं है
ये किस सीमा तक सही है
कि एक भाई दूसरे से लड़ता है
दूसरा तीसरे से झगड़ता है
क्यों ये हिंसा शान्त नहीं हो सकती ?
क्यों सबके हृदय में अग्नि है धधकती ?
सब एक दूसरे से भेद-भाव रखते है
हिंसा के सिवाय वह कुछ नहीं कर सकते है
उनके मस्तिष्क में मात्र क्रान्ति है
किसी के पास कहीं नहीं शान्ति है
शान्ति तो केवल एकता से मिलती है
और तभी हिंसा की बुनियाद हिलती है
किन्तु हम संगठित न हो कर ज्वालामुखी के समान विस्फोटित होना जानते है
हिंसा को ही अपना आदर्श मानते है
क्या हम उन गाँधी को भूल गये
जिन्होंने हमें एक हो कर रहना सिखाया ?
क्या हम उन नेहरू को भी भूल गये
जिन्होंने हमें शान्ति का पाठ पढ़ाया ?
उत्तर वस्तुतः ‘हाँ‘ है
वो प्रेम, सदभावना, बन्धुत्व सब कहाँ है ?
अब हमें ये द्रढ़ निश्च्य करना है
कि शान्ति के पथ पर चल के हमें
एक नये भारत का निमार्ण करना है
क्या ये सम्भव होगा ?
ये हम भारतवासियों पर निर्भर करता है |
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