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| घट और गुण |
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घट जो गुण रहित है, निरीह है असहाय
यह तो गुण पर निर्भर है कि उसे किस ओर ले जाये
गुण यदि लघु है तो मध्य में रूक जायेगा
यह देख घट भी स्वंय लज्जित हो जायेगा
घट चाहे कितना ही भव्य हो आकार में,
गुण बिना जा नहीं सकता वो जल संसार में
मैं नहीं मानती कि गुण घट का है बन्धन
कंठ से लग के घट का करता अभिनन्दन
गुण स्वंय घट को गन्तव्य तक ले जाता है
फिर वहीं घट अमृत ले ऊपर आता है
अत्रत्व मानव उस अमृत का कर लेते है पान
ये देख घट और गुण का बढ़ जाता है मान
गुण जर्जर होता यदि तो गिर जाता वो घट
घट टूटा होता यदि तो जल कैसे आता झट
मेरी मात्र यही अभिलाषा सब घट के समीप गुण हो ।
और घट से बस एक प्रार्थना गुण से तुम अमृत भर दो । |
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