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| वन्दना |
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कमल पर विराजति सुमुकुट माथे सोहति
श्वेत वर्ण, वीणा वादन ध्वनि मन सभी का मोहति
तीव्र लोचन कर कमल जस वाणी अमृत घोलती
अज्ञान से अज्ञानियों के नेत्र पट स्व खोलति
जय सरस्वती-2 सर्व दिशा बोलती
अधर लगे मनो कुंजकली जबहि
अधरान मिलावति है
सुन्दर रूप श्वेत मुर्ति सबहि के हिय का भावति है
कर्ण लगे सुख प्राप्त करन जब गीत वो अपना गावति है
ऐसी माँ को कहे रोली किसके हिय में न विराजति है
जय सरस्वती-2 ज्ञान रस बरसावति है
भूरि-भूरि शत नमन तुम्हारा
सर्व दिशा ध्वनि आवति है
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