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| जीवन के रस |
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हास्य की नौका में बैठ कर
करूण सागर में
वीर भाव से वेग से चलते हुए
कहीं तुम ये न समझ लेना
कि सागर और नौका दोनों वात्सल्य भाव से पूर्ण है
ऐसी अवस्था में एक ही वस्तु काम आयेगी
ईश्वर भक्ति
उसी का नाम ले कर जीवन नौका को हास्य मत समझो
अन्यथा मृत्यु तुम्हारे समक्ष श्रृंगार कर के
वीभत्स रूप में खड़ी होगी
जो कि अत्यन्त भयानक होगी
कितनी अदभुत किन्तु कितनी सत्य बात है
मन को शान्त रखोगे तो निश्चय ही जीवन के रस को प्राप्त करोगे । |
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