| श्रद्धांजलि |
|
मन करता है कि बचपन की कुछ
यादो मे हम खो जाये
इतना डूबे उन यादो में कि लौट के
वापस न आये
वो दिन भी कितने अच्छे थे जब
हम मनमानी करते थे
दिन भर दौड़ा भागी करते
दिन भर शैतानी करते थे
जब टीका लगवाने की बारी,
कभी हमारी आती थी
तो सच मे प्यार से माँ की तरह
वो साथ हमारे जाती थी
सब दर्द कही चला जाता,
जब हाथ को पकड़ा करते थे
वो मेरी है नही मेरी है,
हम दोनो झगड़ा करते थे
हम गलत करे कुछ,
हमे बचाने वो आगे आ जाती थी
फिर बाद में हमको प्यार से,
धीरे से
सब कुछ समझाती थी
वो जाये जहाँ, हम पीछे-2 उनके
जाया करते थे
कभी गरम समोसे, ठन्डी कुल्फी
संग मे खाया करते थे
हम कपडे कौन से क्या पहने वो खुद
सिलवा के लाती थी
अपने हाथो से फिर हमको,
वो प्रेम सहित पहनाती थी
हमें बाल कटाने हों जब भी,
हम उनके साथ ही जाते थे ।
उनके निर्देशों पर अपने,
हम बढ़िया बाल कटाते थे ।
कहीं गिर जायें हम चोट लगे
तो साहस हमको देती थी
खुद बन कर वैद्य हमारी वो,
सब घाव ठीक कर देती थी ।
कुछ बातें ऐसी होती है
जो माँ से सिर्फ कही जाती
हम बिना झिक सब कह देते,
इस प्यार से हमको समझाती
वो इतनी अच्छी मित्र थी
सारी बात हृदय की जाने थी
कुछ कहे बिना ही जान ले सब कुछ
पड़ी जरूरत नहीं बताने की
बड़े प्रेम स्नेह वात्सल्य सहित
उन्होंने कन्यादान किया
तन,मन, धन से पूर्ण समर्पित
मेरी माँ को सम्मान दिया
जब आँखों से आँसू भर कर,
दे दी विदाई हाथों से
तब बड़ा ही धरिज और शिक्षा दी,
उन्होंने अपनी बातों से
जब बेटी जैसी की बेटी
एक नन्हीं परी बन कर आई
तो सबसे ज्यादा खुश वो थी
मानो सारी खुशियाँ पाई
पर जीवन का ये सत्य ही है
कुछ खोया हमने, कुछ पाया
पाया तो है पर जो खोया,
उसको खो कर फिर न पाया
वो माँ तो नहीं पर माँ जैसी
वो हमको सचमुच लगती थी
किया जो भी उन्होंने हमारे लिए
एक ’’माँ सी’’ सी कर सकती थी
कुछ ऐसी थी मेरी माँसी,
इस तरह याद कर लेते हैं
हम स्नेह सहित भावुकता संग
उनको श्रद्धांजलि देते हैं । |
|
| |
|