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| पहचान |
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सब कहते कि वो हिन्दू है वो सिक्ख है वो मुसलमान
शिक्षित होने से लाभ है क्या जब इसका उनको नहीं ज्ञान
ये जाति पाति के भेदभाव
करते मेरे अन्तर में घाव
ये रंग जाति का भेद है क्यों
अज्ञान का सब पे प्रेत है क्यों
सबके मन में कर्कशता है
प्रतिदिन कोलाहल मचता है
सबका अपना-अपना है स्वार्थ
कोई व्यक्ति नहीं है क्षमाप्रार्थ
जाति का आवरण सबके मुख पे
कोई काम नही आता दुख में
उसने जब हमको एक बनाया
तब भेद-भाव का प्रश्न क्यों आया
सर्वरक्त-रंजित कर के दिखाते है सब हस्त-लाघव
क्या ये पहचान पर्याप्त नहीं कि हम सब है एक मानव ।। |
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