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कल्पना और यथार्थ
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कवि यदि चाहे तो रेगिस्तान में भी झरने बहा सकता है
शुष्कता में आर्द्रता की कल्पना तक कर लेता है
किन्तु सत्य तो वास्तव में सत्य ही होता हैं
गाँवों का रमणीय वर्णन, ग्रामवासियों का प्रसन्न जीवन मात्र कविताओं तक सीमित होता है
किन्तु यथार्थ तो यथार्थ ही होता है
मेरा ध्यान भी एक ऐसे गाँव की ओर जाता हैं ।
किन्तु यहाँ मेरे और अन्य कवियों के दृष्टिकोण में कुछ अन्तर सा आ जाता है
वहाँ की मिट्टी में जल पड़ने से सुरभि तो फैलती है
किन्तु उसका आनन्द लेने वाले प्रसन्न चेहरे मुझे दिखाई नहीं देते
वहाँ वर्षा भी होती है,
आकाश में इन्द्रधनुष भी दिखता है
किन्तु उससे पहले मेरी दृष्टि उनके माथे पर खिचे आभावों के इन्द्रधनुष पर पड़ती है
जो बिल्कुल अमिट होती है
वहाँ हरे भरे वृक्ष और खेत तो है
किन्तु मैंने वहाँ बंजर और शुष्क धरती भी देखी है
जो अपनी असमर्थता की कहानी कहती है
और उसमें पड़ी लकीरे गाँववालों के
असंख्य घावों का वर्णन करती है ।
वहाँ के लोग खेती तो करते है,
किन्तु वो खेत उनके अपने नहीं होते,
वो पेट भी भरते है, किन्तु वो
पेट उनके अपने नहीं होते
वहाँ, बच्चे वस्त्र तो पहनते है
किन्तु उनके वस्त्र उनकी दरिद्रता की कहानी कहते है
वो मात्र कहने को वस्त्र होते है
वास्तव में वो कितनें त्रस्त होने है
ग्रामवासिनी घड़ा लेकर जल भरने तो जाती है
किन्तु स्वच्छ जल के स्थान पर
किटाणु युक्त पानी ही पाती है
उसकी पायल ’’यदि है’’ तो बजती तो है
किन्तु उसमें से मधुर ध्वनि के
स्थान पर थके हुए बोझिल पावों
का रुदन सुनाई देता है
जो मेरे क्या सभी के हृदय को दुखी कर देता है
वहाँ सूर्य अपनी सुषमा के साथ उदय तो होता है
किन्तु उसका प्रकाश उनकी अन्धेरी
कोठरी में नहीं पहुँच पाता
साधनों के आभाव में उनका
जीवन नर्क बन जाता है
फिर ऐसी स्थिति में कवि
सौन्दर्य की कल्पना कैसे कर पाता है
किन्तु एक बात अवश्य है
वहाँ निर्धनता में भी स्वाभिमान है
और यही हमारे भारत देश की अटूट पहचान है
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