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| लालसा |
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अधिक, और अधिक, सबसे अधिक पाने की लालसा
मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है
जो सर्वाधिक प्राप्त कर ले
वो समस्त क्षेत्रों में निपुण है
आज के युग में हमारा यही द्रष्टिकोण है
इन इच्छाओ की प्राप्ति में भी कई मोड़ है
किन्तु इनका अन्त, इनका अन्त कही नही है
जैसे धरती और आकाश का मिलना
कदापि सम्भव नही है
धन, यश, बल और सत्ता पाने की होड़ में मनुष्य कहाँ
और उसका नैतिक स्तर कहाँ जा रहा है
कि पर्याप्त होने पर भी वह सन्तुष्टि खोता जा रहा है
सर्वाधिक पा के भी वह, उससे भी अधिक पाने की इच्छा करता है
और इस इच्छा पूर्ति सघंर्ष के पथ पर सदैव डरता रहता है
कि वह उसे पाने के बजाय उसे खो न दे
और ऐसी इच्छा पूर्ति से क्या लाभ जो मनुष्य को चिन्ता ग्रस्त रखे
ऐसी लालसा से क्या लाभ जो मनुष्य को सदैव त्रस्त रखे
और वह जीवन का आनन्द न ले सके
सन्तोष की अनुभूति न कर सके
मात्र प्राति आधिक प्राप्ति के चक्र में फँसा रहे
जो वास्तव में उसे मिलने वाला नहीं है
आश्चर्य तो इस बात का है कि जीवित रहते तो
वह इच्छाओं के पाश में जकड़ा रहता है
किन्तु मृत्यु के समय भी यह इच्छा रखता है
कि मरने के बाद उसे स्वर्ग की प्राप्ति हो
मेरे विचार से जो जीवन में सन्तोष के स्वर्ग को न भोग पाया
वो मरने के बाद स्वर्ग क्या भोग पायेगा
जो सन्तोषी व्यक्ति होगा, वही उस स्वर्ग को भोग पायेगा
अतः यदि हमें जीवन और जीवन के बाद के स्वर्ग को प्राप्त करना है,
तो हमें धैर्य और सन्तोष रखना होगा
तभी हमारा जीवन वास्तव में एक सकल जीवन होगा
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